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'संदेश' की रचना-यात्रा: भटकाव से एकाग्रता तक एक लेखक का अनुभव

हम में से कई लोगों की आदत होती है कि हम एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं; सच कहूँ तो मेरी यही सबसे बड़ी चुनौती रही है। किसी एक विचार या प्रोजेक्ट पर काम करते-करते अचानक मन दूसरे विचार की ओर बहक जाता है। मैं इसे अक्सर 'मल्टीटास्किंग' की आड़ में छिपाने की कोशिश करता था, लेकिन गहराई से देखूँ तो यह कोई मल्टीटास्किंग नहीं बल्कि केवल भटकाव ही रहता था।  जब मेरे उपन्यास 'संदेश' का विचार मेरे दिमाग में पहली बार आया तो मुझे लगा था कि यह यात्रा भी वैसी ही रहेगी। ' वज़ीर ' लिखा जा चुका था, उसकी साज-संवार के साथ कुछ कहानियों और ' काउन्ट फ़िल' के अंतिम अध्याय पर काम चल रहा था, ' नरसिंह कुटीर ' का खाका तैयार हो रहा था… मैंने यही सोचा था कि अपनी पुरानी आदत के हिसाब से बाकी रोज के कामों और इन  साहित्यिक विचारों के साथ-साथ धीरे-धीरे इसे भी लिखता रहूँगा।  लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे  भीतर से बदलकर रख दिया।  'संदेश' की कथावस्तु और उसके रहस्यों ने मेरा ध्यान बँटने ही नहीं दिया। इतिहास, दर्शन और भारतीय मनीषा के ताने-बाने से उपजी इस कहानी को पन्नों प...

नेताजी की प्रैक्टिकल एप्रोच और आज का कॉर्पोरेट वर्ल्ड - लॉयल्टी, लेटरल हायरिंग और वर्कप्लेस चेंज

 सन 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज  के पुनर्गठन की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने सबसे बड़ा चैलेंज बेहद कम समय में एक अनुशासित, ट्रेंड और कॉम्बैट-रेडी सेना खड़ी करने का था। स्क्रैच से एक नया ढांचा तैयार करने में सालों लग जाते, जबकि परिस्थिति इमीडिएट एक्शन की मांग कर रही थी। ऐसे में नेताजी ने एक बेहद प्रेक्टिकल और रणनीतिक कदम उठाया। उन्होंने मुख्य रूप से उन भारतीय सैनिकों को आजाद हिंद फौज का आधार बनाया जो पहले ब्रिटिश सेना का हिस्सा थे। गौर करने वाली बात यह है कि ये सैनिक पहले उसी सिस्टम के लिए काम कर रहे थे, जिसके खिलाफ नेताजी का पूरा मिशन था।         नेताजी ने उनके पास्ट बैकग्राउंड के बजाय उनके स्किल्स, मिलिट्री ट्रेनिंग, स्ट्रेटेजिक माइंडसेट और एग्जीक्यूशन एबिलिटी पर भरोसा जताया। वो बहुत अच्छी तरह जानते थे कि केवल इमोशंस, नारों और पैशन से बड़े युद्ध नहीं जीते जाते; उसके लिए कड़े अनुशासन, डोमेन एक्सपीरियंस और एक्सपर्टाइज की जरूरत होती है। कैप्टन शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों जैसे लीडर्स इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण बने कि...

वज़ीर: एक विचार के वटवृक्ष बनने की यात्रा

कहानियाँ हमेशा अपना रास्ता खुद चुनती हैं। ' वज़ीर ' की शुरुआत बहुत साधारण थी — जब अक्टूबर 2017 में इस कहानी का केंद्रीय विचार मन में आया, तब इसे केवल तीन अंकों की एक फ़ेसबुक पोस्ट होना था। मैंने पहले भी अपनी कहानियों को दो या तीन पोस्ट के माध्यम से क्रमवार तरीके से लिखा था, इसलिए यह तरीका मुझे सहज लगता था। लेकिन जैसे-जैसे मैंने इसे लिखना शुरू किया, मुझे समझ आ गया कि यह फ़ेसबुक के दायरे से बाहर रहकर ही पनप सकती है — लेकिन कितना? वो आगे मालूम पड़ने वाला था। वज़ीर का पहला ड्राफ्ट केवल सत्रह A4 पन्नों का था। इसमें केवल दो अध्यायों की रूपरेखा-मात्र थी और कथानक का मोटे तौर पर अंदाज़ा हो रहा था। दूसरे ड्राफ्ट में इसे विस्तार देकर लगभग पचास पेजों तक पहुँचाया, जिसमें कुछ घटनाओं के नाम और पात्रों की उपस्थिति की ओर संकेत के साथ ही बीज विचार का उल्कावत प्रस्फुटन था — वो प्रकट होता, कहानी में मोड़ की ज़रूरी वजह बनता और फिर कथा के अदृश्य आसमान में ग़ायब हो जाता; पीछे रह जाती उसे देखकर मन में उठी अधूरी इच्छाओं के पूरा होने की एक मौन ललक। इस रूप को जिसने भी पढ़ा, उसने पूरी कहानी पढ़ने की ज़ोरद...

पारिजात: जब सृष्टि सोती है, तब क्यों खिलता है हरसिंगार

जहां दूसरे फूलों का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीत जाता है कि वे वृक्ष की डाल पर किसी भी तरह टिके रहें, दूसरों से ऊपर दिखाई दें - अपना पारिजात उनसे अलग मार्ग पर चल पड़ता है। इस उद्यान में जब हर फूल अपने अस्तित्व को उच्च स्वर में गा कर सुना रहा है, वहीं हरसिंगार अपने आगमन को लेकर भी मौन ही रहता है। जब पूरी सृष्टि सो रही होती है, तब वह बिना किसी साक्षी के, करतल ध्वनियों की लालसा के बिना, अंधेरे की गोद में चुपके से जागता है, रात्री के आकाश को अपलक निहारता है मानों तारों से बनते, उभरते दैवीय संदेशों को पढ़ रहा हो और फिर अधरों पर एक मुस्कान लिए अपनी टहनी का संग छोड़ देता है।  क्या वो विधाता का लिखा कुछ ऐसा पढ़ लेता है जो सांसारिक आँखों से ओझल ही रहता है? उसका पूरा अस्तित्व ही झड़ जाने और बिखर जाने का उत्सव क्यों है? उसमें प्रातः काल के उगते सूर्य को देखने का भी मोह क्यों नहीं है ... कहीं दूर कोई गुरुदेव टैगोर के शब्दों को स्वर दे रहा है — मैं तो हताश और निराश था, मुझे लगा कि मेरा सारा प्रयत्न व्यर्थ चला गया। मुझमें तुम्हें खोजने की कोई शक्ति नहीं बची थी, परन्तु तुम मुझे खोज रहे थे। सुबह जब ...

Nokia 3310: The Immortal King of Cell Phones

आज जब चीजों की उम्र दिनों और हफ्तों में में नापी जाने लगी है तब ये सोचकर हैरानी होती है कि कभी 3310 जैसा एक फोन भी हुआ करता था, जो अमरौती खाकर जन्मा था; वो  यूं ही भूकंप के बाद ढही इमारतों के मलबे से हफ्तों बाद भी हँसते-मुसकुराते बाहर निकल आता, पानी में गिर जाये तो धूप में सूखते ही फिर गाने लगता, ट्रक के नीचे आ जाये तो फूँक मारते ही उठ खड़ा होता।      बनाने वालों ने उसमें बैटरी की बजाय एक ठौ परमाणु बिजली घर फिट किया था - तब दोपहर बारह बजे सोकर उठते ही एक-एक कर अपनी तमाम चांदो को फोन लगाना शुरू करो और रात को उगते चाँद की रोशनी में बैटरी पर नज़र डालो - तो वो वैसे ही टनाटन फुल; ज़िंदगी में रौनक उसी के कारण थी। चांद एक-एक कर बदलती रही, लेकिन वो वहीं का वहीं बना रहा - उसके बरोब्बर चल सके, इतना माद्दा किसी में था ही नहीं। 

पंगत का दर्शन : जीवन का स्वाद, संघर्ष और संतोष

 दौड़ कर पंगत में जगह घेर ली है, सांस ज़ोरों की चल रही हो लेकिन खुशी है कि पहला संघर्ष कामयाब रहा; दो साल तक किताबों के पीछे भागने के बाद आखिरकार ठीक-ठाक कॉलेज मिल गया है, खर्चे को लेकर सांस थोड़ी ऊपर नीचे हो गई थी लेकिन खुशी है कि पहली लड़ाई जीत ली।      नमक तो सभी की पत्तल पर रखा जा चुका है अब बस बाकी का इंतज़ार है, तभी हल्की सी हवा चली तो पत्तल उड़ने को बेसब्र हो उठी, जैसे-तैसे उस पर खाली कुल्हड़ धरकर उड़ने से बचाया; पढ़ाई तो खैर सभी की शुरू हो गई है, लेकिन अब बाकी सपनों का इंतज़ार है, इस बीच प्यार का एक छोटा सा झोंका क्या आया कि ज़िंदगी जीने को बेसब्र हो उठी, जैसे-तैसे खाली जेब का बोझ उस पर रखकर बहकने से बचाया। 

A Star Named 'Bibha': The Legacy of Bibha Chowdhuri

सुश्री बिभा चौधुरी ने कभी शादी नहीं की। वो कुल छह भाई-बहन थे, लेकिन उनकी बाकी चार बहनें और इकलौता भाई भी आजीवन अविवाहित ही रहे; तो दुनिया की सोच का वो हिस्सा, जो शादी को उपलब्धि के रूप में देखता है, इस बात को लेकर उनसे कोई शिकायत करता तो शायद अपनी इस ' अनुपलब्धि ' पर भी वो वैसे ही मुस्कुराकर मौन रह जाती, जैसी कि वो आजीवन अपनी उपलब्धियों को लेकर रहीं।      २३ वर्ष की आयु में १९३६ में कलकत्ता विश्वविद्यालय से भौतिकी में एमएससी करने वाली वो अकेली महिला थीं,

बड़े अच्छे लगते हैं: ख़ामोशी, संगीत और बिछोह के बीच पिरोई एक प्रेम-कथा

झील के किनारे गूँजती हुई वायलीन की उदास धुन हवा में धीमे-धीमे घुल रही है, परंपरा है कि हवा को अभी जाना होगा लेकिन झील को तो वहीं रहना हैं, ये बिछोह तो उसे सहना ही होगा और ये दर्द जैसे केवल हवा और झील का ही नहीं बल्कि उसके किनारे बैठे जोड़े का भी है। वर और वधू दोनों उसके किनारे बैठे हुए हैं और फिर लड़का बहुत हल्के संगीत के साथ धीमे से अपनी बात कह देता है, 'बड़े अच्छे लगते हैं, ये धरती, ये नदिया, ये रैना.... '  लड़की धीमे से पूछती है, 'और ....?' जब वो बोलती है तो पूरा संगीत थम जाता है, उसकी आवाज ही इतनी मधुर है कि उसके सामने संगीत का मौन रह जाना ही ठीक है; स्वर यदि पुरुष के पास हैं उन्हें सँवारने वाला संगीत स्वयं स्त्री है - और अब वही संगीत दूर जा रहा है ....

अरंडी — बंजर सोच और योग्यता को कुचलने का प्रतीक

अरंडी के पौधों को रेगिस्तान पसंद है। वहाँ उनके लिए कोई चुनौती नहीं होती, दूर-दूर तक ये खतरा नहीं होता कि बड़ी झाड़ियों और विशाल वृक्षों के बीच उन पर किसी की नजर नहीं पड़ेगी - उनके अस्तित्व को एक पहचान मिले इसके लिए रेगिस्तान होना ज़रूरी है ... जीवनशून्य मरुस्थल, व्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन अरंडी के लिए तो वो लाभदायक है, इसीलिए हितोपदेशकालीन अरंडी के पौधे निर्जन, बंजर में उगना अपने लिए खुशकिस्मती मानते थे।  परंतु आधुनिक अरंडी के पौधे उनसे बहुत आगे हैं, वो किस्मत पर भरोसा करने की बजाय कर्म पर विश्वास करते हैं - अपने 'अरंडीत्व' को बनाए बनाए रखने के लिए वो जहां उगते हैं, वहीं रेगिस्तान बनाने लग जाते हैं।  उनके आसपास कोई भी ऐसा पौधा नहीं पनप सकता जिसमें महावृक्ष बनने की संभावनाएं हों। वो बहुत चौकस निगाहे रखते हैं, हर पौधों को करीब से परखते हैं और यदि उसमें खुद से ऊंचे निकलने की ज़रा भी संभावनाएं पाते हैं तो उसे समूल उखड़वा देते हैं। उनके करीब वही पनप सकता है जो समझ, बुद्धि और आकार में उनसे भी छोटा हो .... तो यदि अचानक ही कहीं ज्ञान सरिता से हीन, घनी झाड़ियों और महावृक्षों से...

When the Elders Disappear - The Silent Collapse of a Society

  कुछ दशक पहले दक्षिण अफ्रीका के क्रूगर नेशनल पार्क को, हाथियों की तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या का सामना करना पड़ा। जब समस्याएँ ज्यादा गहराई तो वहाँ अधिकारियों ने हाथियों की संख्या को नियंत्रित करने के लिए एक योजना बनाई - भोजन पानी की सीमितता को देखते हुए विचार हुआ कि वृद्ध हाथियों को हटाकर युवा हाथियों के लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं; सो कुछ बुजुर्ग हाथी मार दिये गए।      लेकिन इसके साथ ही एक चिंताजनक समस्या खड़ी हो गई, बचे हुए युवा हाथियों ने असामान्य और आक्रामक व्यवहार दिखाना शुरू कर दिया - वे अधिक हिंसक हो गए, और नेशनल पार्क में रहने वाले गैंडों और अन्य जानवरों पर हमला करने लगे - उनका ऐसा बर्ताव पहले कभी नहीं देखा गया था।

The Speech That Lincoln Thought Was a Failure

 लिंकन को वह आग्रह बहुत ही साधारण तरीके से भेजा गया था, आयोजकों को ये कतई उम्मीद नहीं थी कि लिंकन उनका न्योता स्वीकार कर लेंगे; पर लिंकन ने उसे स्वीकार कर लिया। अवसर था गेटिसबर्ग में सैनिकों के राष्ट्रीय समाधिस्थल के समर्पण का। वह गृहयुद्ध जो 6,20,000 सैनिकों की बलि लेने वाला था,अपने चरम पर था।       ऐसे समय 1 जुलाई से 3 जुलाई 1863 के बीच गेटिसबर्ग में दोनों पक्षों (यूनियन और कन्फ़ेडरेट्स) के बीच एक बेहद रक्त रंजीत लड़ाई हुई जिसमें दोनों तरफ के कुल 41,112 सैनिक बलिदान हुए। समाधिस्थल इन्ही सैनिकों को समर्पित था। जब नवंबर 19 को लिंकन इस कार्यक्रम में भाग लेने पहुंचे 

समोसा: परतों में लिपटा इमोशन

समोसा होने की शर्त भी वही है जो इश्क की है - एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ... और वो इस शर्त को शब्दशः पूरा करता है, वो गर्म तेल में डूबता है तो बस इसलिए कि उसे किसी से नहीं ... बल्कि किसी के लिए इश्क हो जाना है, अब बताईये भला उससे प्यार कैसे ना हो। और बात केवल ऊपरी दिखावे की नहीं बल्कि वो भीतर से भी उतना ही खूबसूरत है; अपने भीतर ढेर सारे सपने समेटी हुई मैदे से बनी और तेल में तपी सुनहरी, कुरकुरी परत से जब जीभ की मुलाक़ात होती है तो लगता है डूबते मन के किसी कोने में उम्मीदों का सूरज उतर आया हो और जैसे ही उसे पार करो तो स्वादों का एक तेज बहाव दिमाग के हर तनाव को अपने साथ बहा ले जाता है।

The Diving Bell and the Butterfly: A Story of Unwavering Will

  सात मार्च १९९७ को एक पुस्तक प्रकाशित हुई; पहले ही दिन उसकी पच्चीस हजार प्रतियाँ बिक गई, सप्ताह भर में डेढ़ लाख और उसके बाद ये सिलसिला थमा ही नहीं - मूल पुस्तक फ्रांसीसी में थी, आने वाले समय में उसका अन्य भाषाओं में अनुवाद हुआ और दसियों लाख प्रतियों की बिक्री के साथ वो पूरे यूरोप में बेस्ट सेलर बनी। किताब के अँग्रेजी संस्करण का नाम था - 'द डाइविंग बेल एंड द बटरफ्लाई'। लेखक थे ज्यां डोमिनिक, एक पत्रकार और 'एल' (ELLE) पत्रिका के संपादक। पुस्तक छपने के दो दिन बाद ही न्यूमोनिया से उनकी मृत्यु हो गई - किताब कितनी सफल रही ये वो कभी नहीं जान पाये। लेकिन अपनी जिस सफलता के बारे में वो जानते थे, वो पुस्तक की सफलता से बहुत ज्यादा बड़ी थी।

The Curious Case of the Stolen Dupatta

इन्हीं लोगों ने ले लीन्हा दुपट्टा मेरा ♫♪ ...  गाना सीधा-साधा है, सुनो तो लगता है कि जैसे साहिबज़ान (मीना कुमारी) आरोप लगा रही है कि इन्हीं लोगों ने मेरा दुपट्टा लिया है; शायद बाहर तार पर सूखने के लिए डाला था और इन्हीं में से कोई एक उसे ले गया। लेकिन फिर ध्यान आता है कि वो कह रही है - ले लिया ना कि चुरा लिया; तो क्या ये काम साधिकार किया गया है? क्या उस दुपट्टे के मालिकाना हक को लेकर कोई मसला था? क्या ये एक आरोप ना होकर एक सूचना है? इस अकेली मासूम सी पंक्ति में अब कई परतें नजर आ रही है, और शायद ऐसा ही है भी। किसी कपड़े का दुपट्टा हो जाना, एक दुर्लभ और सम्माननीय यात्रा है, वो सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता और साहिबज़ान उसके कोमल और नाजुक पहलू से हटकर केवल व्यावसायिक पक्ष की बात कर रही है। वो जानती है कि अगर वो ऐसा नहीं करेगी तो मामला जज़्बाती हो जाएगा और फिर तलवारे निकलते देर नहीं लगेगी - वो अभी तलवारों की धार नहीं देखना चाहती, सो एक नए आग्रह के साथ आगे बढ़ती है कि - 

George Harrison's Song: A Metaphor for Life

' मंजिल तक पहुँचने के कई अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं, हो सकता है एक रास्ते से मंजिल पाने में बरसों लग जाये और वहीं दूसरे मार्ग से वो कुछ ही दिनों में हासिल हो जाये... ' जब जॉर्ज हैरिसन के गीत 'देहरादून' की ये लाइन सुनो तो समझ आ जाता है कि वो सिर्फ सड़क की बात नहीं कर रहे, बल्कि उसके बहाने ज़िंदगी के बारे में बोल रहे हैं; देहारादून उनके लिए कोई शहर नहीं बल्कि उनकी आध्यात्मिक यात्रा का एक पड़ाव है। जब १९६८ में बीटल्स ने खुद को खोजने और पाने की इच्छा से ऋषिकेश में अपना समय बिताया तो उन्होने कई गीत रचे, कुछ कहते हैं तैंतीस गीत थे तो दूसरे अनुमान अड़तालीस की बात करते हैं, लेकिन जो एक बात खुद 'द बीटल्स' के सदस्यों ने मानी थी तो वो यही कि ऋषिकेश में बिताया उनका समय - उनकी रचनात्मकता का शिखर था; वो प्रकृति की गोद में बैठे, दैवीय वातावरण में सांस लेते हुए एक के बाद एक गीत रचते चले गए.... और उसी समय जॉर्ज हैरिसन ने 'देहरादून' रचा। ये गीत कभी किसी एल्बम का हिस्सा नहीं रहा, संभवतः हैरिसन के सनातन की ओर झुकाव ने इस रत्न को अलग ही रहने दिया।

Carving Eternity: The Ancient Carnelian Bull

The Bull of Haryana - A Riddle in Stone A Masterpiece from the Age of the Ancients  कलाकृति छोटी सी है, इतनी छोटी कि उसे सुविधापूर्वक अपनी हथेली पर रख, आँखों के करीब लाकर उसका आराम से निरीक्षण किया जा सकता है, और जैसे ही ऐसा करते हैं, उसकी कला के विस्तार का अंदाजा लगना शुरू होता है जो उसके बाद हर पल बस बढ़ता ही जाता है। जिस भी कलाकार ने इसे बनाया होगा उसने पहले पत्थर का अच्छे से परखा होगा, उसमें बनी हुई हर लहर को देखकर उसकी भूमिका तय की होगी और फिर ही उसे तराशने का काम शुरू किया होगा। लघुमूर्ति की हर रेखा प्रवाहमयी लगती है लेकिन साथ ही वो बैल के आकार को स्पष्ट भी करती चलती है। 

A Love Story Sent to the Stars The Voyager's Journey of Science and Love

 प्यार में गहरी डूब चुकी 27 साल की एक युवती के दिमाग की गहराइयों में क्या चल रहा होगा, ये जानने की उत्सुकता शायद किसी को भी हो सकती है। कार्ल ने बस दो दिन पहले ही एन के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था, दोनों की दोस्ती को कुछ बरस हो चुके थे, फिर एक प्रोजेक्ट पर साथ काम करते करते एक दिन कार्ल ने शादी का प्रस्ताव रखा, जिसे एन ने दिल की गहराइयों से मान भी लिया। दो दिन बाद प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में एन का EEG लिया गया, रिकॉर्डिंग लगभग एक घंटा चली। उस दौरान चेतन रूप में तो एन प्रकृति, दर्शन, संस्कृति, इतिहास जैसी बातों पर विचार करती रही पर अवचेतन में उसका दिमाग अभी भी उल्लास, उमंग और उत्साह वाली उसी अवस्था में था जो शायद किसी भी इंसान की ज़िंदगी में केवल एक ही बार आती है और ईईजी ने उसे पकड़ने में कोई गलती नहीं की। पूरी रिकॉर्डिंग को एक मिनट में 'कंप्रेस' कर, सोने का परत चढ़ी तांबे की एक डिस्क - गोल्डन रिकॉर्ड, में लिख दिया गया। 

कद्दू : स्वाद की दुनिया का बेताज बादशाह

  भिंडी के पास रूप है, बैंगन के पास रंग और गोभी के पास जटिलता है, लेकिन कद्दू? उसके के पास ऐसा कुछ भी नहीं है जो पहली नज़र के प्यार को मजबूर कर दे - मामूली सा रंग, बेढब सा आकार और उस पर उबाऊपन की हद तक सादगी। खरीदने भी जाओ तो बोदे को थैले में सबसे नीचे रखना पड़ता है कि कहीं मुलायम टमाटर का वक्त से पहले कीमा ना बना दे। फ्रिज में घुसता नहीं है, आसानी से कटता नहीं; चमड़ी कुछ इस कदर मोटी कि कहीं नाजुक कलाइयों में मोच ना आ जाये, सो व्यवस्था देनी पड़ी - इसे महिलाएं नहीं काटेंगी, केवल पुरुष काटेंगे - चौके में रहकर भी जिसके ऐसे बगावती तेवर हो उसे अब क्या ही कहा जाये?

यूफ़ोर्बिया: कंटीले बख्तरबंद में छिपा एक चिर-वैरागी योद्धा

 अगर कायदा यही है कि काटों भरे रास्ते पर चलकर ही ताजों को पाया जायेगा, तो विजेताओं की उस कतार में भी सबसे पहला नाम यूफोर्बिया का ही आयेगा; कंटीले बख्तरबंद को पहन, चुपचाप अपने संघर्षों से जूझता एक योद्धा, उसने खुद को स्त्रियोचित ख़ुशबुओं से नहीं सजाया, ना ... उस जैसे कठोर योद्धा पर तो उग्रता ही सजती है, प्रचंड उग्रता। > अगर कायदा यही है कि काटों भरे रास्ते पर चलकर ही ताजों को पाया जायेगा, तो विजेताओं की उस कतार में भी सबसे पहला नाम यूफोर्बिया का ही आयेगा; कंटीले बख्तरबंद को पहन, चुपचाप अपने संघर्षों से जूझता एक योद्धा, उसने खुद को स्त्रियोचित ख़ुशबुओं से नहीं सजाया, ना ... उस जैसे कठोर योद्धा पर तो उग्रता ही सजती है, प्रचंड उग्रता। उसने कोमल रंगों को अपना संगी नहीं बनाया, ना ... उस जैसा शूर तो बस वीरता के ही एक रंग में सजीला लगता है। उसने दुनिया को अपनी आँखों से बदलते देखा है, जब डायनासोर धरती पर टहल रहे थे ये तब भी वहाँ था, और जब वो खत्म हुए ये तब भी पनप रहा था; जिसने अपनी जड़ों से खौलते लावा को तब अमृत समझ कर पीया हो, उसे भला सुगंध और कोमलता कहाँ रास आयेगी, वो तो चिर वैरागी ह...

Apwad the Exception - School Katha

कुछ लोगों को उकेरने के लिए पन्ने के पन्ने कम पड़ जाते हैं, पर अपने लिए तो एक ही शब्द काफी था; एक बेअदब, बेशऊर, बेमतलब सा शब्द, जो लगता था जैसे कतार से छिटक कर बाहर आ गया है; या शायद उसे दूसरे शब्दों ने धकेल बाहर किया हो। बचपन में कहीं पढ़ा था, पर मतलब समझते समझते ज़िंदगी निकल गई, जब लगता कि समझ आ गया, ज़माना राजी ना होता। उसकी पहली पहल याद अक्तूबर के महीने की है, स्कूल में सहभोज था और सबको टिफिन लाना था, जिसे सबके साथ बैठकर खाया जा सके। टिफिन लाने और खाने जैसा काम तो लड़कियां करती थी, अपने जैसे तीसरी क्लास में पढ़ने वाले मर्द तो गेट के बाहर ठेला लगाए बैठी बाई से बेर का चूरन या कबीट खरीद के खाते थे; सो ३६४ दिन मर्द रहो, और एक दिन के लिए टाटपट्टी पर घेरे में बैठकर बेवकूफी करने को दिल ना माना।