किताबों की उस दुकान पर जाना अपने आप में एक अलग ही अनुभव है। वैसे, बाहर से वो किताबों की दूकान कम और कोई कार्पोरेट इमारत ज्यादा लगती है। पार्किंग की अच्छी जगह, ऊंची सी इमारत जो दूर तक लंबी चली गयी है, दायें तरफ कोने में, भीतर जाने का एक छोटा सा दरवाजा। लेकिन भीतर जाते ही माहौल एकदम अलग है। हल्की सी ठंडक, सब कुछ एकदम शांत बस ऐसा लगता है जैसे दूर कहीं कुछ हल्का सा संगीत बज रहा है। कुछ लोग किताबों को यहाँ से वहाँ ले जाते हुये। आगे जाकर दायें तरफ एक बड़ा सा केबिन जहां इस पूरी व्यवस्था के संचालक बैठते हैं। ना जाने क्यों, शायद उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा है कि उन्हे चीफ़ कह कर बुलाना अच्छा लगता है। उस दिन उनके ग्लास के दरवाजे को ठकठका कर भीतर चला गया। चीफ़ कुछ पढ़ रहे थे। "आओ, बैठो। इस बार जल्दी आ गए।" उन्होने अपनी नज़र ऊपर उठा कर कहा। "इस बार किताब कुछ जल्दी खत्म हो गयी सो जल्दी आ गया, चीफ़।" "HS-2646374 की किताब कैसी हालत में आई है?" उन्होने किसी से इंटरकॉम पर पूछा, स्पीकर चालू था। "ठीक ठाक है। कहीं कहीं बिना मतलब कुछ लिख दिया। बाकी ठीक है।" उधर से ...
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