किसी समझदार व्यक्ति ने कभी कहा था - "साइकल चालक वो नासमझ इंसान होता है जो सोचता है कि साइकल उसे सब जगह ले जा रही है, जबकि वास्तव में वो ही साइकल को सब जगह लेकर जाता है।" उनके शहर का तो पता नहीं पर एक वक़्त था जब ये पूरा शहर ही साइकिलों पर घूमता था। उस समय सड़कों पर गाडियाँ का कब्जा नहीं हुआ था, कुछ सरकारी बस और इक्का दुक्का कारें। कभी कभार स्कूटर दिख जाया करते थे।तब बाज़ारो, दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों, सभी जगह साइकिलों को तरतीब से खड़ा करने और लुड़कने से रोकने के लिए लोहे के साईकिल स्टेंड बने रहते थे। वो शहर पर साइकिलों की हुकूमत का दौर था। आबोहवा सेहतमंद थी, आसमान ज़्यादा नीला और धूप अधिक सुनहरी थी। सुबह चिड़ियों की आवाज़ों के साथ होती थी तो रातें टिमटिमाते तारों के सुकून तले गुजरती थी।