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A Page from an Unknwon Student 's Diary - First Love

भूख तो बहुत ज़ोर के लग रही थी पर इसके लिए उसके पास ना तो पैसा था और ना ही वक़्त। चाय की टपरी पर अपनी साइकल लगाते हुये उसने छोटू को "कट" के लिए आवाज़ दी। आज फिर भूख को मिटाने के बजाये चाय मे डुबा कर मारना पड़ेगा। चाय का पहला घूंट भरते ही भूख ने दम तोड़ना शुरू कर दिया, पैरों मे जान सी आने लगी । अभी दूसरा घूंट भरने का सोच ही रहा था कि अचानक उसे उसकी आवाज़ सुनाई दी। तेजी से पलटकर देखा - वही थी। अक्तूबर की सुबह की धूप मे मरून और पीले रंग में बहुत ही सुंदर दिख रही थी। वक्त थम गया, दुनिया मिट गयी। अब ना चाय थी, ना भूख थी, ना ज़िंदगी थी, ना मौत थी। बस वो था और वो थी। धीर धीरे चलते हुये वो  पास से गुज़र  गयी।  ऐसा लगा सितारों के सागर में तैरते हुये ज़िंदगी निकल गयी।  शायद किसी को तलाश रही थी। आगे जाकर ज़रा ठिठकी और फिर खड़ी हो गयी। अपने कंधे के बायीं और देखते वो एक तरफ को हल्की सी झुक गयी थी।