इंसान को हीरो की तलाश हमेशा से ही रही है। इस तलाश में कहीं ना कहीं खुद की खोज भी शामिल रहती है। शायद इसलिए बचपन में हम बच्चों के पाँच-छह साल के नन्हें दिमागों और विशाल कल्पनाओ पर जो एकदम से छा गया वो था ब्रूस ली। वो टीवी से पहले का ज़माना था। मिट्टी के तेल से मिलती जुलती अजीब सी गंध से गंधाता अखबार कुछेक घरों मे ही आता था। सो जानकारियाँ अफवाहों से ही मिलती थी और ब्रूस ली के मामले में तो ये बाज़ार खूब गरमाया, 'ब्रूस ली इतने तेज हाथ चलता है कि शूटिंग स्लो मोशन में करनी पड़ती है',' 'फिल्मों मे वो फर्जी नहीं बल्कि असली पिटाई करता है'। उसकी ताकत, तेजी, और खानपान को लेकर भी बच्चों मे खूब गहमा गहमी थी। ऐसे ब्रूसमय वातावरण में एक दिन घर में मां ने मूँगफली के छिलके हटाकर रखे हुये थे, शायद मूँगफलियों को खलबत्ते में पीसना था। उधर से भैया निकले तो उन्हे इसमें मौका नज़र आ गया। उन्होने इस बाल ब्रूसली फैन को ब्रूस की ताकत और तेजी के राज का खुलासा करते हुये बताया कि वो रोज नाश्ते में सिर्फ मूँगफली के छिलके खाता है। बड़े भाई ऐसे ही होते हैं।