हम में से कई लोगों की आदत होती है कि हम एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं; सच कहूँ तो मेरी यही सबसे बड़ी चुनौती रही है। किसी एक विचार या प्रोजेक्ट पर काम करते-करते अचानक मन दूसरे विचार की ओर बहक जाता है। मैं इसे अक्सर 'मल्टीटास्किंग' की आड़ में छिपाने की कोशिश करता था, लेकिन गहराई से देखूँ तो यह कोई मल्टीटास्किंग नहीं बल्कि केवल भटकाव ही रहता था। जब मेरे उपन्यास 'संदेश' का विचार मेरे दिमाग में पहली बार आया तो मुझे लगा था कि यह यात्रा भी वैसी ही रहेगी। ' वज़ीर ' लिखा जा चुका था, उसकी साज-संवार के साथ कुछ कहानियों और ' काउन्ट फ़िल' के अंतिम अध्याय पर काम चल रहा था, ' नरसिंह कुटीर ' का खाका तैयार हो रहा था… मैंने यही सोचा था कि अपनी पुरानी आदत के हिसाब से बाकी रोज के कामों और इन साहित्यिक विचारों के साथ-साथ धीरे-धीरे इसे भी लिखता रहूँगा। लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे भीतर से बदलकर रख दिया। 'संदेश' की कथावस्तु और उसके रहस्यों ने मेरा ध्यान बँटने ही नहीं दिया। इतिहास, दर्शन और भारतीय मनीषा के ताने-बाने से उपजी इस कहानी को पन्नों प...
Animesh Anant | Raag Bhopali
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