जब कोई हम पर ज़ोर से चिल्लाता है या बहस करने लगता है तो हमारी पहली प्रतिक्रिया उनको, उन्हीं की भाषा में जवाब देने की होती है। चाहे दफ़्तर की मीटिंग हो, बिज़नेस की डील हो या फिर राजनीति का मैदान … हमें बचपन से यही लगता आया है कि जो ज़्यादा आक्रामक है, जो तुरंत पलटवार करता है, वही ताक़तवर है। फिल्मों और ओटीटी ने भी गुस्से और आक्रामकता को ही असली ताक़त बनाकर पेश किया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है? इतिहास और बड़े-बड़े रणनीतिकारों की ज़िंदगी उठाकर देखें तो कहानी बिल्कुल उल्टी है। गुस्से में दिया गया जवाब हमारी ताकत नहीं, हमारी सबसे बड़ी कमजोरी दिखाता है। आक्रामकता एक जाल है, जब हम गुस्से में आकर रिएक्ट करते हैं तो अपने विरोधी की पिच पर खेलने लगते हैं। आक्रामकता में बहुत सारी एनर्जी बेकार जाती है और हम बिना सोचे-समझे अपनी अगली चाल का खुलासा कर बैठते हैं। 'मोहरा' में आनंद जब यह सीख देते हैं कि, ' ठंडा लोहा, गरम लोहे को काट देता है; इसलिए ज़िन्दगी से मुक़ाबला हमेशा शांत रहते हुए करना। ' ( मोहरा, अध्याय 13 ) तो उसके पीछे भी यही दर्शन है। जब सामने ...
Animesh Anant | Raag Bhopali
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