कहानियाँ हमेशा अपना रास्ता खुद चुनती हैं। 'वज़ीर' की शुरुआत बहुत साधारण थी — जब अक्टूबर 2017 में इस कहानी का केंद्रीय विचार मन में आया, तब इसे केवल तीन अंकों की एक फ़ेसबुक पोस्ट होना था। मैंने पहले भी अपनी कहानियों को दो या तीन पोस्ट के माध्यम से क्रमवार तरीके से लिखा था, इसलिए यह तरीका मुझे सहज लगता था। लेकिन जैसे-जैसे मैंने इसे लिखना शुरू किया, मुझे समझ आ गया कि यह फ़ेसबुक के दायरे से बाहर रहकर ही पनप सकती है — लेकिन कितना? वो आगे मालूम पड़ने वाला था।
दूसरे ड्राफ्ट में इसे विस्तार देकर लगभग पचास पेजों तक पहुँचाया, जिसमें कुछ घटनाओं के नाम और पात्रों की उपस्थिति की ओर संकेत के साथ ही बीज विचार का उल्कावत प्रस्फुटन था — वो प्रकट होता, कहानी में मोड़ की ज़रूरी वजह बनता और फिर कथा के अदृश्य आसमान में ग़ायब हो जाता; पीछे रह जाती उसे देखकर मन में उठी अधूरी इच्छाओं के पूरा होने की एक मौन ललक।
इस रूप को जिसने भी पढ़ा, उसने पूरी कहानी पढ़ने की ज़ोरदार इच्छा जताई… और बस, फिर एक यात्रा की शुरुआत हो गई। कहानी हमेशा से वही थी, बस अभी तक उसने खुद को दूसरों की नज़र से छिपा रखा था; लेकिन अब जैसे ही मन बना, उसकी कड़ियाँ एक के बाद एक खुलती चली गईं। एक विचार जो बीज रूप में था, जब वो अंकुरित होकर फैला तो सीधे-सीधे एक महा-वटवृक्ष बना! मुख्य तने से हर तरफ़ डालें निकल रही थीं, उनसे लटकती हुई जड़ें वापस कहानी की ज़मीन पर आतीं और उस टहनी को कल्पना से सींच देतीं।
कभी न दूर होने वाला व्यक्तिगत दुख आया और साथ हो गया; कोविड आया और चला गया; संक्रमित हुए और उबर गए… समय बीतता रहा और अपने साथ कलम को थामे चलता रहा। छह साल बाद जब यह सफर पूरा हुआ तो अपने पीछे छोड़ गया — मोहरा, स्लेपनीर, बिसात, चक्रव्यूह और प्रतिदंड के रूप में पाँच वृक्षों से घिरी एक वाटिका, और उसमें साँस लेते चालीस से ज़्यादा पात्र जो ज़िंदगी के हर पक्ष को छू रहे थे, संघर्ष कर रहे थे, बढ़ रहे थे, अपनी जगह बना रहे थे…
मन में एक उम्मीद है कि जो पाठक इसे पढ़ रहे हैं, और जो आगे पढ़ेंगे — वे इससे कुछ न कुछ लेकर ही निकलेंगे; लेकिन इस कहानी ने जिस एक व्यक्ति को सबसे ज़्यादा सिखाया, पढ़ाया और गढ़ा — वह इसका रचनाकार खुद है।
लोग कहते हैं कि कहानी किसी चट्टान की तरह होती है जिसमें से रचनाकार एक आकार गढ़ता है; शायद वे सही ही होंगे, लेकिन उससे उलट इस एक मामले में यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहाँ — कहानी ने रचनाकार को गढ़ा।
'वज़ीर' को 2017 में लिखना शुरू किया था और छह साल बाद, अक्टूबर 2023 में इसका काम पूरा हो गया था। उसके बाद दूसरी साहित्यिक रचनाओं में कलम व्यस्त ज़रूर हो गई, लेकिन जब भी मन किया और समय मिला, वह 'वज़ीर' की नोक-पलक सँवारने लौट आती। क्या इसकी ज़रूरत थी? शायद नहीं… तो क्या कोई मजबूरी थी? शायद हाँ… इसके साथ लगातार बने रहने का मोह इतना ज़्यादा था कि वो ज़रूरत न होने पर भी मन को मजबूर कर देता था।
ख़ैर, आख़िरकार इस लंबे साथ के बाद अब वह जिस मन में जन्मी, पली और बढ़ी… वहाँ से आगे बढ़कर पाठकों के बीच जा चुकी है। एक बार पढ़कर देखें, शायद आपसे भी वह वैसे ही हँसते-मुस्कुराते हुए बातें करे — जैसी उसने मुझसे हमेशा की।
— अनिमेष
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