कुछ लोगों को उकेरने के लिए पन्ने के पन्ने कम पड़ जाते हैं, पर अपने लिए तो एक ही शब्द काफी था; एक बेअदब, बेशऊर, बेमतलब सा शब्द, जो लगता था जैसे कतार से छिटक कर बाहर आ गया है; या शायद उसे दूसरे शब्दों ने धकेल बाहर किया हो। बचपन में कहीं पढ़ा था, पर मतलब समझते समझते ज़िंदगी निकल गई, जब लगता कि समझ आ गया, ज़माना राजी ना होता। उसकी पहली पहल याद अक्तूबर के महीने की है, स्कूल में सहभोज था और सबको टिफिन लाना था, जिसे सबके साथ बैठकर खाया जा सके। टिफिन लाने और खाने जैसा काम तो लड़कियां करती थी, अपने जैसे तीसरी क्लास में पढ़ने वाले मर्द तो गेट के बाहर ठेला लगाए बैठी बाई से बेर का चूरन या कबीट खरीद के खाते थे; सो ३६४ दिन मर्द रहो, और एक दिन के लिए टाटपट्टी पर घेरे में बैठकर बेवकूफी करने को दिल ना माना।