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Love, Emotion, Taste and the Story of a Samosa

समोसा होने की शर्त भी वही है जो इश्क की है - एक आग का दरिया है और डूब के जाना है ... और वो इस शर्त को शब्दशः पूरा करता है, वो गर्म तेल में डूबता है तो बस इसलिए कि उसे किसी से नहीं ... बल्कि किसी के लिए इश्क हो जाना है, अब बताईये भला उससे प्यार कैसे ना हो। और बात केवल ऊपरी दिखावे की नहीं बल्कि वो भीतर से भी उतना ही खूबसूरत है; अपने भीतर ढेर सारे सपने समेटी हुई मैदे से बनी और तेल में तपी सुनहरी, कुरकुरी परत से जब जीभ की मुलाक़ात होती है तो लगता है डूबते मन के किसी कोने में उम्मीदों का सूरज उतर आया हो और जैसे ही उसे पार करो तो स्वादों का एक तेज बहाव दिमाग के हर तनाव को अपने साथ बहा ले जाता है।

Bruce Lee - The Childhood Hero

इंसान को हीरो की तलाश हमेशा से ही रही है। इस तलाश में कहीं ना कहीं खुद की खोज भी शामिल रहती है। शायद इसलिए बचपन में हम बच्चों के पाँच-छह साल के नन्हें दिमागों और विशाल कल्पनाओ पर जो एकदम से छा गया वो था ब्रूस ली। वो टीवी से पहले का ज़माना था। मिट्टी के तेल से मिलती जुलती अजीब सी गंध से गंधाता अखबार कुछेक घरों मे ही आता था। सो जानकारियाँ अफवाहों से ही मिलती थी और ब्रूस ली के मामले में तो ये बाज़ार खूब गरमाया, 'ब्रूस ली इतने तेज हाथ चलता है कि शूटिंग स्लो मोशन में करनी पड़ती है',' 'फिल्मों मे वो फर्जी नहीं बल्कि असली पिटाई करता है'।  उसकी ताकत, तेजी, और खानपान को लेकर भी बच्चों मे खूब गहमा गहमी थी।  ऐसे ब्रूसमय वातावरण  में एक दिन घर में मां ने मूँगफली के छिलके हटाकर रखे हुये थे, शायद मूँगफलियों को खलबत्ते में पीसना था। उधर से भैया निकले तो उन्हे इसमें मौका नज़र आ गया। उन्होने इस बाल ब्रूसली फैन को ब्रूस की ताकत और तेजी के राज का खुलासा करते हुये बताया कि वो रोज नाश्ते में सिर्फ मूँगफली के छिलके खाता है। बड़े भाई ऐसे ही होते हैं।

Cycle Riding - an Adventure of a different kind

किसी समझदार व्यक्ति ने कभी कहा था - "साइकल चालक वो नासमझ इंसान होता है जो सोचता है कि साइकल उसे सब जगह ले जा रही है, जबकि वास्तव में वो ही साइकल को सब जगह लेकर जाता है।" उनके शहर का तो पता नहीं पर एक वक़्त था जब ये पूरा शहर ही साइकिलों पर घूमता था। उस समय सड़कों पर गाडियाँ का कब्जा नहीं हुआ था, कुछ सरकारी बस और इक्का दुक्का कारें। कभी कभार स्कूटर दिख जाया करते थे।तब बाज़ारो, दफ्तरों, स्कूलों, कॉलेजों, सभी जगह साइकिलों को तरतीब से खड़ा करने और लुड़कने से रोकने के लिए लोहे के साईकिल स्टेंड बने रहते थे। वो शहर पर साइकिलों की हुकूमत का दौर था। आबोहवा सेहतमंद थी, आसमान ज़्यादा नीला और धूप अधिक सुनहरी थी। सुबह चिड़ियों की आवाज़ों के साथ होती थी तो रातें टिमटिमाते तारों के सुकून तले गुजरती थी।