जहां दूसरे फूलों का पूरा जीवन इसी संघर्ष में बीत जाता है कि वे वृक्ष की डाल पर किसी भी तरह टिके रहें, दूसरों से ऊपर दिखाई दें - अपना पारिजात उनसे अलग मार्ग पर चल पड़ता है।
इस उद्यान में जब हर फूल अपने अस्तित्व को उच्च स्वर में गा कर सुना रहा है, वहीं हरसिंगार अपने आगमन कोलेकर भी मौन ही रहता है। जब पूरी सृष्टि सो रही होती है, तब वह बिना किसी साक्षी के, करतल ध्वनियों की लालसा के बिना, अंधेरे की गोद में चुपके से जागता है, रात्री के आकाश को अपलक निहारता है मानों तारों से बनते, उभरते दैवीय संदेशों को पढ़ रहा हो और फिर अधरों पर एक मुस्कान लिए अपनी टहनी का संग छोड़ देता है।
क्या वो विधाता का लिखा कुछ ऐसा पढ़ लेता है जो सांसारिक आँखों से ओझल ही रहता है? उसका पूरा अस्तित्व ही झड़ जाने और बिखर जाने का उत्सव क्यों है? उसमें प्रातः काल के उगते सूर्य को देखने का भी मोह क्यों नहीं है ...
कहीं दूर कोई गुरुदेव टैगोर के शब्दों को स्वर दे रहा है —
मैं तो हताश और निराश था, मुझे लगा कि मेरा सारा प्रयत्न व्यर्थ चला गया।
मुझमें तुम्हें खोजने की कोई शक्ति नहीं बची थी, परन्तु तुम मुझे खोज रहे थे।
सुबह जब मेरी आँखें खुलीं, तो मैंने देखा कि मेरा पूरा उपवन सुगंधित पुष्पों से भरा पड़ा है।
तुमने मुझे मेरी निराशा में अकेला नहीं छोड़ा; तुम गहन अंधकार में आए, और जब मैं सो रहा था,
तुमने मेरे जीवन को अपनी कृपा से भर दिया...
लगता है जैसे कोई पारिजात की ही बात कर रहा हो; शायद उस दैवीय वाटिका से वह हर प्रातः ईश्वर का यही संदेश तो सुनाने आया है कि,
हम भले ही उन्हें ना खोजें, लेकिन वे हमें खोने नहीं देंगे;
हम निराशा में स्वयं को अकेला मान लें, लेकिन वे अकेला नहीं छोड़ेंगे ....
- अनिमेष
पुनश्च: पहले यह फ़ेसबुक पर लिखा था, फिर कुछ दिनों पहले ट्विटर पर पारिजात की महक फैली तो वहाँ भी रोप दिया। अब 'शरद' के आगमन के साथ ही बगिया में इसका उत्सव प्रारंभ हो गया, हर सुबह ये वहाँ 'माँ' की बाट जोहते क्यारी में बिखरे दिखते हैं सो राग भोपाली पर एक स्वर स्वयं ही चहक उठा।
यदि आपको पारिजात से मिलना पसंद आया हो तो एक बार बगिया के चिर-वैरागी यूफ़ोर्बिया से भी मिलते जाइए ।
यदि सुबह होने के पहले यात्रा पर निकल जाना पारिजात का धर्म है, तो टहनी के साथ लंबा और अटूट रिश्ता निभाना यूफ़ोर्बिया का अडिग कर्म।
- अनिमेष

Comments
Post a Comment