सन 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के पुनर्गठन की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने सबसे बड़ा चैलेंज बेहद कम समय में एक अनुशासित, ट्रेंड और कॉम्बैट-रेडी सेना खड़ी करने का था। स्क्रैच से एक नया ढांचा तैयार करने में सालों लग जाते, जबकि परिस्थिति इमीडिएट एक्शन की मांग कर रही थी। ऐसे में नेताजी ने एक बेहद प्रेक्टिकल और रणनीतिक कदम उठाया। उन्होंने मुख्य रूप से उन भारतीय सैनिकों को आजाद हिंद फौज का आधार बनाया जो पहले ब्रिटिश सेना का हिस्सा थे। गौर करने वाली बात यह है कि ये सैनिक पहले उसी सिस्टम के लिए काम कर रहे थे, जिसके खिलाफ नेताजी का पूरा मिशन था।
नेताजी ने उनके पास्ट बैकग्राउंड के बजाय उनके स्किल्स, मिलिट्री ट्रेनिंग, स्ट्रेटेजिक माइंडसेट और एग्जीक्यूशन एबिलिटी पर भरोसा जताया। वो बहुत अच्छी तरह जानते थे कि केवल इमोशंस, नारों और पैशन से बड़े युद्ध नहीं जीते जाते; उसके लिए कड़े अनुशासन, डोमेन एक्सपीरियंस और एक्सपर्टाइज की जरूरत होती है। कैप्टन शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों जैसे लीडर्स इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण बने कि अगर रेडी-टू-यूज़ टैलेंट को सही डायरेक्शन और विजन दिया जाए, तो वो गेम-चेंजर साबित होते हैं।
80 साल पुराना यह ऐतिहासिक संदर्भ आज के कॉर्पोरेट वर्ल्ड, मल्टीनेशनल कंपनियों और तेजी से स्केल कर रहे स्टार्टअप्स की कड़वी सच्चाई से पूरी तरह मेल खाता है। जब भी कोई कंपनी अपने शुरुआती दौर से निकलकर बड़े पैमाने पर बिजनेस एक्सपेंशन करती है, तो उसे अपनी पुरानी सीमाओं से बाहर निकलना ही पड़ता है। जिस वर्टिकल, मार्केट या टेक्नोलॉजी में कंपनी की पकड़ कमजोर होती है तो वहां Lateral Hiring के जरिए बाहर से एक्सपीरियर्स्ड और स्किल्ड लोगों को सीनियर लीडरशिप रोल्स में लाना पड़ता है।
परंतु स्केलिंग के इस फेज में वर्कप्लेस के भीतर एक गंभीर साइकोलॉजिकल चैलेंज जन्म लेता है। कंपनी के शुरुआती दिनों में दिन-रात एक करने वाले पुराने और लॉयल एम्प्लॉइज को अचानक यह इनसिक्योरिटी सताने लगती है कि नए लोगों के आने से उनका अथॉरिटी लेवल, रेकग्निशन और रोल कम हो जाएगा। अपनी इसी असुरक्षा और पहचान खोने के डर से कुछ लोग नए आर्गेनाइजेशनल चेंजेज का विरोध करने लगते हैं। अक्सर इस विरोध को सीधे तौर पर मानने की बजाय लोग इसे 'कंपनी का कल्चर खराब होने' या 'कोर वैल्यूज से कम्प्रोमाइज' का नाम दे देते हैं।
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यहाँ यह समझना बेहद जरूरी है कि लॉयल्टी और कमिटमेंट किसी भी सफल कंपनी का फाउंडेशन होते हैं। लेकिन केवल फाउंडेशन अपने आप में पूरी बिल्डिंग नहीं कहलाती। उस पर एक मल्टी-स्टोरी कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर खड़ा करने के लिए नई रूफ, वॉल्स, मॉडर्न टूल्स और स्पेशलाइज्ड स्किल्स की आवश्यकता होती है। जो एम्प्लॉइज हर नए बदलाव या बाहरी टैलेंट के अराइवल को शक की नजर से देखते हैं, वो अक्सर लॉजिक से नहीं, बल्कि अपनी इंटरनल इनसिक्योरिटी से ड्राइव हो रहे होते हैं। ऐसे में नई रिस्पॉन्सिबिलिटी ना मिलने का ब्लेम लगाने के बजाय, यह देखना ज्यादा प्रासंगिक है कि बदलते समय और नई टेक्नोलॉजी के साथ हम खुद को कितना Up skill कर रहे हैं और बिजनेस में क्या वैल्यू-एडिशन दे पा रहे हैं।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि जब वर्कप्लेस में यह तनाव बढ़ता है, तो उसकी पूरी जवाबदेही सिर्फ एम्प्लॉइज पर नहीं डाली जा सकती। किसी भी संगठन में अगर लेटरल हायरिंग फेल होती है या पुराने कर्मचारियों में घबराहट फैलती है, तो उसमें 50% विफलता टॉप लीडरशिप और HR की नीतियों की होती है। बिना रोल क्लैरिटी, प्रॉपर ऑनबोर्डिंग और कल्चरल इंटीग्रेशन के नए टैलेंट को सीधे थोप देना मैनेजमेंट की बहुत बड़ी चूक है। नेताजी की सफलता का राज केवल नए लोगों को जोड़ना नहीं था, बल्कि उन्होंने पुराने कैडर के त्याग का सम्मान करते हुए नए टैलेंट को सेना के मुख्य लक्ष्य के साथ ऐसा पिरोया कि कोई गुटबाजी नहीं पनप सकी।
🐘 संबंधित केस-स्टडी ज़रूर पढ़ें: अनुभवहीन युवा ऊर्जा का ख़तरा: क्रूगर नेशनल पार्क के हाथियों की सबक देने वाली कहानी जब किसी व्यवस्था से बुजुर्गों और अनुभवी मार्गदर्शन को अचानक हटा दिया जाता है, तो केवल अनुशासनहीनता और अराजकता ही बचती है — चाहे वह हाथियों का झुंड हो, समाज हो या कोई संगठन।
आज के कॉर्पोरेट लीडर्स और HR को भी यही संतुलन बनाना होगा। नए और पुराने टैलेंट के बीच पुल बनाने के लिए मैनेजमेंट को एक मजबूत मेंटरशिप मॉडल लागू करना चाहिए, जहाँ पुराने एम्प्लॉइज के डोमेन नॉलेज और कंपनी कल्चर का इस्तेमाल नए टैलेंट को गाइड करने के लिए हो, और नए टैलेंट की आधुनिक तकनीकों का लाभ पुराने एम्प्लॉइज को अपस्किल करने में मिले। जब लीडरशिप निष्पक्ष मेरिटोक्रेसी के साथ-साथ साइकोलॉजिकल सेफ्टी सुनिश्चित करती है, तभी कंपनी वास्तविक अर्थों में वटवृक्ष बनती है।
किसी भी कंपनी के लिए नीश (Niche) सेगमेंट में सिमटकर रहना बहुत आसान होता है। लेकिन अपना मार्केट शेयर बढ़ाने, रेवेन्यू ग्रो करने और वास्तविक कॉर्पोरेट लीडरशिप हासिल करने के लिए रिस्पॉन्सिबिलिटीज को डेलीगेट करना और नए टैलेंट को ऑनबोर्ड करना ज़रूरी हो जाता है। कोर टीम के एम्प्लॉइज का कंट्रीब्यूशन हमेशा रिस्पेक्टेड रहेगा, लेकिन कंपनी को एक सस्टेनेबल और लार्ज-स्केल आर्गेनाइजेशन बनाने के लिए समय के साथ नई प्रतिभाओं को एक्सेप्ट करना ही वक्त की मांग है। जो लोग इस ब्रॉड विजन को समझते हैं, वे कंपनी के साथ ग्रो करते हैं। वहीं जो अपनी पुरानी सीमाओं और असुरक्षाओं में ही बंधे रहना चाहते हैं, उनके करियर ग्रोथ की रेस में पीछे छूट जाने का रिस्क हमेशा बना रहता है।
यह पूरी बात किसी पुराने एम्प्लॉई की अनदेखी की नहीं, बल्कि बदलती बिजनेस एक्सपेक्टेशंस, प्रभावी लीडरशिप और मेरिट को निसंकोच स्वीकारने की है। कॉर्पोरेट हिस्ट्री इस बात की गवाह रही है कि जो कंपनियां अपनी एप्रोच में रिजिड रहीं और नए बदलावों के लिए दरवाजे बंद रखे, वे इवेंचुअली मार्केट से बाहर हो गईं। इसके विपरीत, जिन लीडर्स ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तरह प्रैक्टिकल माइंडसेट, विजनरी थिंकिंग और मेरिटोक्रेसी को प्राथमिकता दी, उन्होंने न केवल नए बेंचमार्क सेट किए, बल्कि पूरा इंडस्ट्री लैंडस्केप बदल दिया।
(Facebook पर अपनी ही लिखी एक संगठन केंद्रित पोस्ट पर आधारित; पोस्ट की लिंक कमेन्ट सेक्शन में नीचे।)
- अनिमेष

नेताजी सुभाष चंद्र का व्यावहारिक दृष्टिकोण: संगठन विस्तार, निष्ठा और बदलाव का सच -
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