सन 1943 में जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के पुनर्गठन की जिम्मेदारी संभाली, तो उनके सामने सबसे बड़ा चैलेंज बेहद कम समय में एक अनुशासित, ट्रेंड और कॉम्बैट-रेडी सेना खड़ी करने का था। स्क्रैच से एक नया ढांचा तैयार करने में सालों लग जाते, जबकि परिस्थिति इमीडिएट एक्शन की मांग कर रही थी। ऐसे में नेताजी ने एक बेहद प्रेक्टिकल और रणनीतिक कदम उठाया। उन्होंने मुख्य रूप से उन भारतीय सैनिकों को आजाद हिंद फौज का आधार बनाया जो पहले ब्रिटिश सेना का हिस्सा थे। गौर करने वाली बात यह है कि ये सैनिक पहले उसी सिस्टम के लिए काम कर रहे थे, जिसके खिलाफ नेताजी का पूरा मिशन था। नेताजी ने उनके पास्ट बैकग्राउंड के बजाय उनके स्किल्स, मिलिट्री ट्रेनिंग, स्ट्रेटेजिक माइंडसेट और एग्जीक्यूशन एबिलिटी पर भरोसा जताया। वो बहुत अच्छी तरह जानते थे कि केवल इमोशंस, नारों और पैशन से बड़े युद्ध नहीं जीते जाते; उसके लिए कड़े अनुशासन, डोमेन एक्सपीरियंस और एक्सपर्टाइज की जरूरत होती है। कैप्टन शाहनवाज खान, प्रेम सहगल और गुरबख्श सिंह ढिल्लों जैसे लीडर्स इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण बने कि...
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