हम में से कई लोगों की आदत होती है कि हम एक साथ कई काम करने की कोशिश करते हैं; सच कहूँ तो मेरी यही सबसे बड़ी चुनौती रही है। किसी एक विचार या प्रोजेक्ट पर काम करते-करते अचानक मन दूसरे विचार की ओर बहक जाता है। मैं इसे अक्सर 'मल्टीटास्किंग' की आड़ में छिपाने की कोशिश करता था, लेकिन गहराई से देखूँ तो यह कोई मल्टीटास्किंग नहीं बल्कि केवल भटकाव ही रहता था।
जब मेरे उपन्यास 'संदेश' का विचार मेरे दिमाग में पहली बार आया तो मुझे लगा था कि यह यात्रा भी वैसी ही रहेगी। 'वज़ीर' लिखा जा चुका था, उसकी साज-संवार के साथ कुछ कहानियों और 'काउन्ट फ़िल' के अंतिम अध्याय पर काम चल रहा था, 'नरसिंह कुटीर' का खाका तैयार हो रहा था… मैंने यही सोचा था कि अपनी पुरानी आदत के हिसाब से बाकी रोज के कामों और इन साहित्यिक विचारों के साथ-साथ धीरे-धीरे इसे भी लिखता रहूँगा।
लेकिन इस बार कुछ ऐसा हुआ जिसने मुझे भीतर से बदलकर रख दिया।
तो सच कहा जाए तो — जितना मैंने 'संदेश' को रचा, उससे कहीं ज़्यादा 'संदेश' ने मुझे एक लेखक के रूप में रचा। इसने मन को एक ठहराव दिया और उन हरकतों को अनुशासित किया, जिन्हें मैं आदत कहना पसंद करता था… इसी ने मुझे एकाग्रता का असली अर्थ समझाया।
'संदेश' की बुनावट में भारत के प्राचीन मंदिरों, स्थानों और इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। मेरी बहुत इच्छा थी कि कहानी में वर्णित सभी महान धरोहरों — जैसे धोलावीरा, एलोरा, एलिफेंटा, मदुरै, कोणार्क और चिदंबरम— को व्यक्तिगत रूप से घूमकर आऊँ। लेकिन जिम्मेदारियों, व्यावहारिक परिस्थितियों और यात्राओं को लेकर अपनी ही कुछ उलझनों के चलते हर स्थान पर पहुँच पाना संभव नहीं हो सका।
शुरू में मुझे लगा था कि शायद यह दूरी मेरी रचना प्रक्रिया को सीमित कर देगी लेकिन ये आश्चर्य की बात ही रही कि ऐसा बिलकुल नहीं हुआ।
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लिखने के लिए मैं जैसे-जैसे विषय की गहराई में उतरता गया तो अध्ययन और मेरी अपनी चेतना आपस में इस तरह जुड़ गए कि लगा जैसे इतिहास के पन्नों से निकलकर वो स्थान मानो खुद ही अपनी कहानियों के रहस्य उजागर कर रहे हों ।
यह अजीब लग सकता है लेकिन कई बार वास्तव में ऐसा महसूस होता था मानो किसी अदृश्य धागे ने समय और दूरी की सीमाओं से परे उन ऐतिहासिक स्थलों की वास्तविक आत्मा से जोड़ दिया हो।
मेरे लिए लेखन की यह यात्रा केवल एक फिक्शन गढ़ने का काम ही नहीं रहा बल्कि खुद को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से फिर से जोड़ने की एक आध्यात्मिक और बौद्धिक यात्रा भी साबित हुई।
मुझे ऐसा लगता है कि कहानी लिखना केवल पात्रों और घटनाओं को गढ़ना भर नहीं है, बल्कि ये हमारे भीतर छिपे उन सूत्रों को ढूँढने की यात्रा भी है जो आज भी हमें रास्ता दिखाते हैं। 'संदेश' मेरे लिए वही खोज थी, जिसने कम से कम रचना के उस दौर में, मुझे मेरे भटकाव से निकालकर एक स्थायित्व प्रदान किया।
- अनिमेष

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